Tuesday, July 28, 2009

फ़कीरी मौज

बहुत फिक्र कर चुके इस ज़माने की
अब किसी इल्ज़ाम से नहीं डरते हैं

कौन कहता है क्या ये परवाह नहीं
जो जी को भाता है कर गुजरते हैं

साहिल के पास जाकर नहीं रुकते
अब तो हम मँझधार में उतरते हैं

मौत से डरते नहीं हैं हम लेकिन
जि़न्दगी से बहुत प्यार करते हैं

दिल के ज़ख्मों से हो गए बेपरवाह
अब तो रोज लगते और भरते हैं

औरों से कोई गिला अब क्या करना
जो भी गिला है वो रब से किया करते हैं

सुना है दिल में दिलवर रहा करता है
इसी ख्याल में दिन मौज में गुजरते हैं

फाँक लिया है फिक्र को ज़माने की
बने "फकीरा" तब से खूब मौज करते हैं

-के.पी.सिंह "फ़कीरा"

0 Comments:

Post a Comment

<< Home