दोहे ( भाग-१)
खुशी पाय बौराय जग, सहि न सके दुख बोझ।
क्यों सुख दुख हैं व्यापते, करे न इसकी खोज।।
खुद तू शाश्वत जीव है, नश्वर से सुख चाहि।
दुख का कारण है यही, बात न समझे काहि।।
जब तक मन भाये जगत, तब तक मौत हराय।
जिस पल हरि दिल में बसें, मौत स्वयं डर जाय।।
धरम किताबी पढ़ लिया, कुछ समझा कुछ नाहिं।
यही समझना बहुत है, तू ही सबके मांहि।।
भक्त कभी नहिं भूलता, अपने प्रभु का ध्यान।
सुख दुख उसे न व्यापते, हरि की लीला जान।।
ज्यों रसना है चाहती, रोज नये पकवान।
त्यों रुचि लखि कें भक्त की, रूप धरें भगवान।।
चार चरण है धर्म के, सत्य, दया, तप, दान।
दान प्रमुख कलिकाल में, कर देता कल्यान।।
दूजा लाख करे जतन, है नहिं बस की बात।
सुखी दुखी रहना यहाँ, वन्दे तेरे हाथ।।
लौकिकता में लिप्त मत, खुद को रखिये तात।
दर्शक बन देखो जगत, तभी बनेगी बात।।
सुत से जितनी प्रीति है, उतनी हरि से होय।
खुद तो वन्दे तरेगा, सुत को भी सुख होय।।
-के.पी.सिंह 'फकीरा`


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